नंगलाल की नौकरी बैंक में कैशियर के पद पर उसी बैंक में लग गई
जिसमे उसके पिता रंगलाल का खाता था । मौके का फायदा उठाने
के लिए रंगलाल कुछ फटे-पुराने नोट ले गया जमा कराने, लेकिन
नंगलाल ने वे नोट स्वीकार नहीं किये ।
नंगलाल : ये नोट बदलिए........
रंगलाल : क्यों क्या खराबी है ?
नंगलाल : फटे हुए हैं
रंगलाल : तो मैं कौनसा तुम्हारे खाते में जमा कर रहा हूँ, ख़ुद के
ही खाते में तो डाल रहा हूँ, जैसे हैं वैसे ही डाल दो.........
नंगलाल : तो मेरी क्या ज़रूरत है आपको ? अपने हाथों से ही
इन्हें अपनी पासबुक में दर्ज़ कर लीजिये ...और रूपये भी ख़ुद के
पास ही रख लीजिये ...ही ही ही

ज्योतिषी महाराज ने रंगलाल का हाथ देखा
ज्योतिषी : वाह वाह अगले साल तुम्हारे नीचे कार होगी
रंगलाल : नहीं हुई तो ?
ज्योतिषी : तुम कार के नीचे होवोगे..........हा हा हा
पेट भरने पर उपवास का उपदेश देना सरल है
-इटालियन कहावत

हालाँकि ये किसी भी कवि के लिए गर्व की बात होती है कि उसकी
रचनाओं को लोग याद करके औरों को सुनाये...........परन्तु कवि
को ख़ुशी केवल तब होती है जब उसकी किसी ख़ास और उम्दा
कविता को ही लोग इस प्रकार विस्तार दें ।
बात जब व्यावसायिक मंच की हो और कविता कविता नहीं बल्कि
एक बिकाऊ सामान की तरह तैयार की गई हो तब कोई भी ये
बर्दाश्त नहीं करेगा कि उसके मंच जमाऊ टोटकों को अन्य लोग
सुना सुना कर इतनी पुरानी करदे कि जब उसका मौलिक
रचनाकार सुनाये तो लोग कहें कि भाई ये तो सुना हुआ है.....ये
तो उसका है वगैरह
मैंने इस वेदना को बहुत झेला है और आज भी झेल रहा हूँ । लेकिन
अब तो ये बीमारी इतनी फ़ैल गई है कि बर्दाश्त से बाहर हो गई है ।
अनेकानेक लिक्खाड़ कवि इससे परेशां हैं और उठाईगीर मज़े
कर रहे हैं ।
ताज़ा घटना है इसलिए बताता हूँ ........जिस दिन हाई कोर्ट ने
अयोध्या पर निर्णय दिया था और कुछ ख़ास लोगों ने इसके विरुद्ध
सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात कही थी उस दिन मैंने एक पैरोडी
अपने मंचीय काव्यपाठ के लिए लिखी थी " राजीव कह गये
सोनिया से, ऐसा कलजुग आएगा - कहाँ हुआ था जनम राम का,
सुप्रीम कोर्ट बताएगा "
यह मैंने कुछ मंचों पर सुनाई भी और कुछ मित्रों को sms भी
की.....नवरात्रि में राजस्थान के कवि-सम्मेलनों में भी यह ख़ूब
ताली बजवाऊ पंक्तियाँ साबित हुईं लेकिन आज हालत ये है
कि मैं तो हूँ एक और एक ही जगह सुना सकता हूँ जबकि देश
बहुत बड़ा है ...कम से कम बीस कवि सम्मेलन रोज़ होते हैं
इसलिए कुछ भले लोग मौके का लाभ उठा कर सुना डालते हैं
और जम भी जाते हैं............
जमो भाई जमो..... अपनेराम किसी के कुछ तो काम आ रहे हैं
........यही सोच कर ख़ुश हो लेते हैं ...हा हा हा हा हा

कल अर्थात 22 अक्टूबर 2010 की शाम देश के कई बड़े बड़े कवि
और कवयित्री गुजरात की सांस्कृतिक राजधानी बड़ौदा में
इन्डियन ऑयल द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलन में
काव्य -प्रस्तुति देंगे ।
देश के जाने -माने हास्य-व्यंग्यकार,
कवि और कवि-सम्मेलनों के संयोजक -संचालक डॉ माणिक मृगेश
के रससिक्त संचालन में काव्य-पाठ करने कल मैं भी
बड़ौदा जा रहा हूँ ।
आप चल रहे हैं क्या आनन्द लेने ?
आज, आज से मेरा मतलब है 09 अक्टूबर की शाम गुजरात की
सांस्कृतिक राजधानी बड़ौदा में मुझे मेरी लाफ़्टर चैम्पियन वाली
प्रस्तुति देनी थी, अब जहाँ देनी थी वो जगह थी लक्ष्मी निवास पैलेस
यानी महाराजाधिराज गायकवाड़ का राजमहल परिसर, यानी एक
ऐसी जगह जिसे देख कर भारत के गौरव और ऐश्वर्य पर गर्व से
छाती फूल जाती है और पूरा देखने लगो तो सांस फूल जाती है ।
खैर ...अवसर था एक इन्टर-नेशनल सेमिनार का जिसमे विश्वभर
के जाने-माने डॉक्टर, प्रोफ़ेसर और स्कॉलर शामिल हुए थे। भारत
से भी बहुत लोग आये, लेकिन ज़्यादा लोग विदेशी ही थे । सबकुछ
था वहां, भोजन-भाजन तो हाई-फ़ाई था ही, एक से बढ़कर एक
आइटम डान्सर, एक से बढ़कर एक डान्स ग्रुप और एक से बढ़कर
एक गायक - गायिका जिनके साथ मुझे भी बुला लिया गया था।
प्रोग्राम में किसी का ध्यान था नहीं, सभी लोग या तो आपस में
बतिया रहे थे...या राजमहल के वीडियो बना रहे थे या खाने-पीने
में जुटे थे...मैं किसी का नाम तो नहीं लूँगा लेकिन जब बड़े-बड़े
फ़िल्म स्टार, हॉट-म-हॉट आइटम डान्स और सारे सिंगर एक
एक करके शहीद हो गये, तो मुझे बुलाया गया । अब ऐसे माहौल
में मैंने भी कौन सा तीर मार लेना था, लिहाज़ा जैसे ही मैं शुरू
हुआ कुछेक भारतीयों ने ख़ूब ताली-वाली बजाई । मुझे जोश आ
गया तो मैंने गुजरात और भारत की संस्कृति की बहुमंजिली
कवितायेँ शुरू कर दीं । अब लोग थोड़े ठण्डे पड़ गये तो आयोजक
बोले ,"ये लोग समझ नहीं पा रहे हैं , इंग्लिश में बोलो"
मैंने कहा-नहीं बोलूँगा, मैं जब विदेश जाता हूँ तो मुझे इनकी भाषा
समझ नहीं आती..ये लोग मेरे लिए हिन्दी बोलते हैं क्या ?
आयोजक बहुत बोले, लेकिन मैं अड़ गया, मैंने कहा - मैं आज़ाद
देश का नागरिक हूँ और गुलामी की भाषा बोलने के लिए बाध्य नहीं
हूँ.........इन विदेशियों को पता तो चलना चाहिए कि हमारी भी
अपनी भाषा है जिसमे हम अपनी शान और संस्कृति की बात कर
सकते हैं
कुल मिला कर, परिणाम ये हुआ कि दसेक मिनट की ही हाजरी
लगी अपनी और पैसा मिला पूरा तो मुझे लगा ..वाह ! आज तो
फ़ोकट में ही पैसा मिल गया ..जय हिन्दी-जय हिन्द !
और हाँ शुभ नवरात्रि भी
वैसे एक बात बताऊँ अन्दर की......किसी से कहना मत....मेरा
अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं है लेकिन मैं बोलता कैसे ? मुझे आती
ही नहीं......अनपढ़ जो ठहरा.......हा हा हा हा हा हा
अभी तीन दिन पहले अहमदाबाद में बहुत बड़ा कवि सम्मेलन
था दी गुजरात एस्टेट डेवलेपर्स एसोसिएशन यानी सरल शब्दों
में बिल्डर्स एसोसिएशन का जिसमे देश भर के ख्यातनाम कवि-
कवयित्रियों ने काव्यपाठ किया । उस भव्य कवि-सम्मेलन का मंच
सञ्चालन किया था दिल्ली के गजेन्द्र सोलंकी ने ।
चूँकि मैं कद-काठी में ठीक-ठाक हूँ इसलिए मुझे प्रस्तुत करते हुए
गजेन्द्र सोलंकी ने यह कह कर बुलाया कि ये देश का सबसे लम्बा
कवि है जो खड़ा हो कर देखे तो संतरे भी निम्बू दिखाई देते हैं........
इस चुटकी पर लोगों ने ख़ूब ठहाका लगाया । लेकिन अपन तो ठहरे
अपन !
मैंने खड़े होते ही कहा कि भाई मैं तो बिलकुल भी लम्बा नहीं हूँ,
लम्बे तो थे मेरे पूज्य पिताजी, जो एक बार जैसलमेर गये और
लोगों से कहा कि भाई मुझे ऊंट दिखाओ, ऊंट देखना है । उनकी बात
सुन कर लोगों ने पिताजी को नीचे से ऊपर देखा और कहा कि साहब
आप क्यों तकलीफ़ करते हैं ? हम ऊंट को ले आते हैं, वो आप को
देख लेगा ...हा हा हा हा हा हा हा हा
इस बात पर हमारे संयोजक राजकुमार भक्कड़ ने तो ठहाका
लगाया ही उनके पिताश्री नारायणदास भक्कड़ भी अपनी हँसी
नहीं रोक पाए ।