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Wednesday, October 28, 2009

तुम्हारे बच्चे और मेरे बच्चे हमारे बच्चों को पीट रहे हैं

एक विधवा के चार बच्चे
एक विधुर के चार बच्चे
दोनों ने आपस में शादी कर ली
फ़िर हो गए चार बच्चे
कुल बारह बच्चे
बहुत अच्छे
एक दिन पत्नी ने पति को फोन किया
ऐ जी सुनते हो ..........
जल्दी से घर पे आओ
घर को गृहयुद्ध से बचाओ
क्योंकि आप वहाँ
ऑफिस में कलम घसीट रहे हैं
और यहाँ
तुम्हारे बच्चे और मेरे बच्चे मिलकर
हमारे बच्चों को पीट रहे हैं ___हा हा हा हा

Sunday, October 11, 2009

कोई ऊँच नीच नहीं है, सब नीच ही नीच है .............

हास्य कवि सम्मेलनों में एक जुमला आजकल खूब चल रहा है कि भारतीय

राजनीति में कोई ऊँच नीच नहीं है, सब नीच ही नीच है ......... ये बात समझ

में भी आती है........


मेरे मित्र कवि स्वर्गीय श्याम ज्वालामुखी कि कुछ पंक्तियाँ दे रहा हूँ :


पहुँच गए हम भी नेतागीरी के इंटरव्यू में

प्रश्न था क्या आपने कभी किसी अंधे भिखारी के कटोरे में

एक रूपये का सिक्का दाल कर दो का सिक्का उठाया ?

हमने कहा नहीं !

वे बोले- क्या ख़ाक नेता गीरी निभाओगे...

एक अंधे को तो बेवकूफ बना नहीं सके,

सौ करोड़ आँख वालों को कैसे बनाओगे...........

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