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Saturday, July 2, 2011

रंगलाल और नंगलाल ने किया मानसून पर चिन्तन





रंगलाल और नंगलाल आज गम्भीर थे और बरसात पर

चिन्तन कर रहे थे ।


रंगलाल : बेटा नंगू ! जब बरसात के कारण बाढ़ आती है और

लोग मरते हैं तो मुझे बहुत दुःख होता है । अगर भगवान ने चाहा

तो मैं एक ऐसी सुरंग बनाऊंगा जिसमे पूरे शहर के लोग अपने

ज़रूरी सामान के साथ समा सके और स्वयं को बाढ़ के प्रकोप से

बचा सके ।



नंगलाल : बहुत नेक ख्याल है आपका । लेकिन पापा, लोग बाढ़ से ही

नहीं, सूखे से भी परेशान हैं । कई क्षेत्रों में बादल तो आते हैं पर बरसते

नहीं । तो ऐसे बादलों को काबू करने के लिए मैं इत्ता लम्बा लट्ठ

बनाऊंगा जिससे धरती पर बैठे बैठे ही बादल में सुराख़ करके उसे

बरसा सकूँ ।


रंगलाल : शाबास नंगू ! लेकिन इत्ता बड़ा लट्ठ तू रखेगा कहाँ ?


नंगलाल : आपकी सुरंग में..................हा हा हा हा


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Wednesday, June 22, 2011

पापा कुछ तो इन्साफ कीजिये..............





रंगलाल
ने नंगलाल से कहा - बेटा नंगलाल !

रात बहुत हो गई है ...बत्ती बुझादे


नंगलाल - आप आंखें बन्द कर लो और बत्ती बुझ गई है

ऐसा समझ लो


रंगलाल - ठीक है, ये मेरा चश्मा वहां रख दे....


नंगलाल - चश्मा उतारो मत पापा, सोते समय चश्मा लगायेंगे

तो सपने साफ नज़र आयेंगे


रंगलाल - ठीक है बेटा ! पर अलार्म तो लगा दे.........

नंगलाल - पापा कुछ तो इन्साफ कीजिये,

दो बड़े बड़े काम मैंने किये हैं,

ये छोटा सा एक काम तो आप कीजिये

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