Friday, July 2, 2010

अपने पदचिन्हों को मुझे अपने हृदय में रखने दो



किनारा  नदी से कहता है - 


मैं तुम्हारी  लहरों को नहीं रख सकता .  


अपने पदचिन्हों को मुझे अपने हृदय में रखने दो . 


- गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर 







धनवान होना अच्छा है, बलवान होना अच्छा है, 



लेकिन  बहुत से मित्रों का  प्रेम-पत्र होना  और भी अच्छा है 


-यूरिपिडीज़





4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आदर्श वाक्य बहुत बढ़िया हैं!

डॉ टी एस दराल said...

बहुत सुन्दर वचन । आभार ।

Rohit Singh said...

खूबसूरत बातें। मित्रों के प्रेम पत्र होना सच में एक अलग ही एहसास है...

दीनदयाल शर्मा said...

वचन में विलक्षण शक्ति है, यदि हम उसका सही उपयोग कर सकें तो.... hansimajaak.blogspot.com

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